René Descartes (रेने देकार्त)

जो व्यक्ति अपने बिस्तर पर अधिक समय तक लेटा रहता है। तो उसे हम आलसी या बीमार कहते हैं। लेकिन एक ऐसा व्यक्ति था, जिसने कहा कि कोई इंसान किसी सही सोच को अगर बिस्तर पर लेट कर सोचें तो वह उस सोच में काफी हद तक कामयाब हो सकता है। इस बात को कहने वाले व्यक्ति को दुनिया आज रेने देकार्त के नाम से जानती है। जिन्हें father of co-ordinate geometry तथा father of modern cycology भी कहा जाता है।
         
 रेने देकार्त का जन्म 31 मार्च 1596 ई को फ्रांस के एक छोटे से कस्बे में हुआ था। इन्होंने जीवन के सभी सिद्धांतों को गणितीय कसौटी पर परखने का सिस्टम प्रस्तुत किया।
              21 वर्ष की उम्र में शिक्षा समाप्त करके रेने देकार्त orange के राजकुमार मोरिस के सेना में भर्ती हो गए। यहां पर वह अवकाश का समय mathematics के अध्ययन में गुजारा करते थे। इन्होंने कई युद्ध में भाग लिया। Duke के साथ हुए युद्ध में इन्होंने बड़ी दिलेरी दिखाई। जिसके कारण इन्हें लेफ्टिनेंट जरनल की उपाधि प्रदान की गई परंतु उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया और वह पेरिस आकर लगातार तीन वर्ष तक cycology और mathematics पर अध्ययन करते रहे। इसी बीच उन्होंने co-ordinate geometry का आविष्कार किया। जिसे mathematics के क्षेत्र में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। co-ordinate geometry के आविष्कार के बाद geometric construction को ग्राफ द्वारा दर्शाना आसान हो गया।
            रेने देकार्त प्लेटो, अरस्तु, अलहैजन और अलगजाली से काफी प्रभावित थे। दुनिया के टॉप1st mathematician सर आइज़क न्यूटन रेने दकार्ते को आदर्श मानते थे।
           रेने देकार्त ने सबसे पहले इंद्रधनुष के कोण और प्रकाश के परावर्तन के बारे में समझाया तथा उन्होंने यह भी बताया कि मानव शरीर के दो भाग होते हैं। पहले भाग को भौतिक शरीर कहते हैं। जो मशीन की तरह कार्य करता है तथा दूसरे भाग को मान या आत्मा कहते हैं। जो भौतिक नियम से हटकर होता है और यह शरीर को कंट्रोल करता है।
          रेने देकार्त को प्रश्न(question) पूछने तथा उसका हल(solution) ढूंढने का बहुत शौक था। उनका यह कथन बहुत प्रसिद्ध था कि "मैं सोचता हूं इसलिए मेरा अस्तित्व है अगर में सोचना बंद कर दूं तो ना दुनिया को मुझ से कोई फायदा होगा और ना मैं दुनिया से कोई फायदा उठा सकूंगा।" 
          11 फरवरी 1650ई को मात्र 53 वर्ष की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए और हमें बता गए कि हमारी सही सोच उस मंजिल तक पहुंचा सकती है। जिस मंजिल के बारे में हम हमेशा सोचते हैं।

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