Major General Shah Nawaz Khan (जनरल शाहनवाज खान)
एक ऐसा व्यक्ति जिसके बारे में बहुत ही कम लोग जानते हैं, और वह भी वैसे लोग जो पुराने ख्यालात के हैं। आज के इस आधुनिक समय में तो मुझे नहीं लगता कि कोई जानते होंगे। कुछ पुराने ख्यालात के लोग या जो लोग अपने देश के बारे में अच्छा सोचते हैं या देश के लोगों के बारे में जानने की इच्छा रखते हैं। वे लोग ज्यादातर महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू से परिचित होंगे। वरना इस आधुनिक समय में तो लोग अपने माता-पिता के बारे में भी उतना नहीं जानते। जितना कि टीवी(tv) पर आने वाले अभिनेता(hero)और अभिनेत्रियों(actress) के बारे में जानते हैं।
मैं एक ऐसे छिपे हुए व्यक्ति के बारे में बताना चाहूंगा। जो कि हमारे देश को आजाद करवाने में अपना खून-पसीना एक कर दिया। वह व्यक्ति है, जनरल शाहनवाज खान। इनका जन्म रावलपिंडी (पाकिस्तान), में 24 जनवरी, 1914 को हुआ था। इनके पिता का नाम इक्का खान था। जो कि अंग्रेजी सेना में कैप्टन थे। बाद में शाहनवाज खान भी अपने पिता से प्रेरित हो अंग्रेजी सेना में भर्ती हो गए। द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हो गया था। उस समय सिंगापुर अंग्रेजों के अधीन था। तो अंग्रेजी सेना के साथ युद्ध लड़ रहा था। उस युद्ध में जापान ने सिंगापुर के सेना को पराजित कर विजय हासिल किया और सभी सैनिकों को बंदी बना लिया। जिसमें शहनवाज खान भी शामिल थे। जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस सिंगापुर में देशभक्त से ओतप्रोत भाषण देते हैं। तो उससे प्रभावित होकर शाहनवाज खान भी आजाद हिंद फौज में शामिल होने का फैसला लेते हैं और बहुत जल्द ही अपने अद्भुत नेतृत्व क्षमता के कारण सुभाष चंद्र बोस के अधिक करीब आ जाते हैं। उन्होंने एक खास बिग्रेड (टोली) बनाई थी। जिसका नाम था सुभाष बिग्रेड। उसका कमान जनरल शाहनवाज खान को सौंपा गया था। जिसे यह प्रतीत होता है कि वह सुभाष चंद्र बोस के कितने करीब थे। एक बार जापानी सेना के साथ कोहिमा फतेह भी करने जाते हैं। लेकिन किस्मत में तो कुछ और ही था। द्वितीय विश्व युद्ध के समय जापान की पराजय हो जाती है। जिसके कारण आजाद हिंद फौज को भी आत्मसमर्पण करना पड़ता है। अंग्रेज उन से क्रोधित होकर उनका लाल किला पर सव के सामने सजा(public trial) देने का फैसला करती है। उन लोगों पर देश से गद्दारी करने जैसा इल्जाम लगाया जाता है। लेकिन अंग्रेजों का यह फैसला उनके लिए कठिनाई साबित होती है। क्योंकि देश के हर जात, मजहब के लोग एक होकर अंग्रेजों पर इतना जोर डालते हैं कि उन्हें एक छोटा सा जुर्माना पर रिहा करना पड़ता है। उन्हें आजाद करना पड़ता है।
आजादी के बाद जब हिंदू, सिक्ख पाकिस्तान से भारत आ रहे थे और कुछ मुसलमान भारत से पाकिस्तान जा रहे थे। तब जनरल शाहनवाज खान एक ऐसे व्यक्ति थे जो अपने परिवार को दूर पाकिस्तान में छोड़कर भारत आ रहे थे और भारत में बसे थे।इतना ही नहीं जनरल शाहनवाज खान का हमारे देश के प्रति और भी प्रदर्शन (रोल) रहा कांग्रेस ने उन्हें अपनी पार्टी के तरफ से मेरठ से टिकट दिया और वे वहां से जीत गए थे। वे लगातार चार बार मंत्री पद को संभालते रहे। वे अपने काम को इतनी ईमानदारी और निष्ठा से करते थे कि मेरठ जैसे संवेदनशील इलाके पर जब तक वे मंत्री पद (M.P.) पर रहे तब तक वहां पर कोई भी अनहोनी, दंगा जैसी हालत नहीं हुई।
9 दिसंबर, 1983 (भारत) को वह इस मूल को अलविदा कह गए। उनकी मृत्यु हो गई। उन्हें जामा मस्जिद के पास दफना दिया गया।
आज के समय में यह बताया जाता है, कि उनका जो कब्र (मजार) है। वह बहुत ही जर्जर हालत में है। जो व्यक्ति पहली बार लाल किला पर से अंग्रेजों का झंडा हटा कर अपने देश भारत का झंडा लगाया और देश को अंग्रेजों के चंगुल से स्वतंत्र करवाया। जिस व्यक्ति का भारत को स्वतंत्र कराने में इतना बड़ा योगदान रहा। आज उसके कब्र तो दूर की बात है। उसके बारे में लोग जानते तक नहीं है।
मेरी सरकार से भी अनुरोध है कि ऐसे महान व्यक्ति के अस्तित्व को सहेजा जाए ताकि आगे आने वाले पीढ़ी भी उनसे अच्छी तरह से परिचित हो सकें। हमारा भी एक देशभक्त के प्रति कर्तव्य है, कि उनका नाम हर गली, हर शहर, हर गांव, मोहल्ले में उसी तरह पहुंचा दें। जिस तरह कि आज से 60-70 वर्ष पहले उनके समर्थन में लोग हर गली, मोहल्ले में नारा लगाया करते थे।
केवल जनरल शाहनवाज खान ही नहीं उनके जैसे कई स्वतंत्रा सेनानी जो सच में एक अभिनेता(hero) है। जो real life hero हैं। जिनके बारे में लोग नहीं जानते। तो मेरा आपसे अनुरोध है, कि उन लोगों के बारे में भी जानने का प्रयास करें और उन से सीख ले। जिनकी वजह से हम सभी आज आजाद हिंदुस्तान में जी रहे हैं। आजादी से अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनको भी एक बार जरूर नमन करें।
जय हिंद। जय भारत।
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